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उमर की नाव

 उमर की नाव

  - मिथिलेश कुमारी

        



उमर की नांव
-मिथिलेश कुमारी
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अंकुर का संग
पीछे छूट गया ,
बढ चली उमर की बेल,
खुल गए निद्रा के द्वार,
सपना का जाल
मधुर टूट गया ------

बढ चली सागर में नाव
बचपन को यौवन
फिर लूट गया ...

चलना है अभिराम यहां
मत पंख समेटो ,
क्षणभर का विश्राम कहां
मत पंख समेटो.....

लहरों के सघन झकोरों से ,
गर डोल रही हिम्मत नौका
पतवार नाम की याद रखो
मत जाने दो स्वर्णिम मौका
मत जाने दो स्वर्णिम मौका
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टिप्पणियाँ

  1. उम्र की बहती नौका को विश्राम कहां
    उसको तो बहते ही जाना है
    बस बहते जाना है
    मिल जाए अंत जहां .....

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