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एक नाजुक वहम



एक नाज़ुक वहम
                    -मिथिलेश

    


एक नाज़ुक वहम
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रात आधी, चांद ने फिर,
 रेत की उस सेज पर,
बिखरा दिया था,
मोतियों की धूल को।१।

और सागर की उफनती,
बावली होकर उछलती,
लहर को करके इशारा,
शांत रहने को कहा था ।२।

हवा हौले बह रही थी,
वृक्ष के कोमल बदन को,
प्यार से सहला रही थी
और तारे आसमान में,
मूक दर्शक बन खड़े थे ।३।

आसमान की गोद में जब, 
चांद सांसें ले रहा था,
तभी मेरी धड़कनों का,
ओढ़कर अनमोल आंचल
गोद में तुम सो गए थे.... ....।4।

और मेरे हाथ दोनों,
  वक्ष पर तेरे रखे थे,
अधर माथे से लगे थे,
अनकहा कुछ कह रहे थे,
जिन्दगी की मधुर धुन में
   गीत कोई सुन रहे थे ।५।

स्वप्न था या सत्य,
कहना कठिन होगा,
कल्पना का बहुत सुंदर,
और नाज़ुक वहम होगा
और नाजुक भरम होगा ।।६।।

 
   

टिप्पणियाँ

  1. नाज़ुक भरम नाज़ुक वहम दोनों ही नज़ाकत के चरम फिर दूर कैसे हों मन पंछी के फड़फड़ाते भरम ??

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