सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ठहरो दीप अभी मत बुझना



ठहरो दीप अभी मत बुझना
             - मिथिलेश

   


 ठहरो दीप अभी मत बुझना
          -----------------------               
ठहरो दीप अभी मत बुझना।
ज्वालाओं  को जल जाने दो,
 युग युग की भूखी लपटों को,
 सारा विश्व निकल जाने दो   .....
  -ठहरो दीप अभी मत बुझना---

 अभी बहुत सरगर्मी नभ में ,
 थोड़ा दृश्य बदल जाने दो,
 लगता राहें  शूल भरी है,
 कुछ तो मुझे संभल जाने दो ,,,,,,
--ठहरो दीप अभी मत बुझना।

  किसका साथ कहां तक होगा 
  ये   सब बातें अनजानी  है ,
  आसपास है सभी अजनबी
  मन को जरा बहल जाने दो,,,,,,
  ---ठहरो दीप अभी मत बुझना।।

  कितना यह कोहराम मचा है ,
  इस क्रदन को थम जाने दो ,
  थोड़ा जहर बचा प्याले में
  धीरे-धीरे  पी   लेने   दो,,,,,,,
 --ठहरो दीप अभी मत  बुझना ।।

    क्या सत्ता की भूखी  लपटें 
    सारा विश्व निकल जाएंगी ?
    मानवता की मोमबत्तियां,
    शायद सभी पिघल जायेंगी ?

    ठहरो दीप ,अभी मत  बुझना।।





टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें