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MAN KI MANMANI Mithilesh

मन की मनमानी   
                        -मिथिलेश 
    


मन     की      मनमानी   
                   
मन भी  बहुत  अजीब  है,      
 कितनी मनमानी करता है , 
  जब मन करे उसका
   कहीं भी भाग जाता है ं .......

     मन भी कितना अजीब है।
           
कोई परमीशन नहीं लगती उसे,
   और न कोई  ' नो ऑब्जेक्शन ' ,
     एक सेकंड में कहाँ से कहाँ  
       टाइम  बेटाइम  पहुँच  जाता है ,.........
   
         मन भी कितना अजीब है।
                   
   और कुछ भी कहीं भी,
     किसी के साथ करने लगता है ,
      ऐसा कुछ, जिसे शब्दों की आंखे,
      देखने    से   कतराती     हैं .......

      मन भी कितना अजीब है।       
                
       कैसा बेलगाम है यह मन ,
         कितनी मनमानी करता है  ?
          कहाँ कहाँ रोकूँ इसको       ,
           क्या करूँ इसका   मैं  अब ? ....... 

            मन भी कितना अजीब है
            कितनी मनमानी  करता है।।
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टिप्पणियाँ

  1. मन से बड़ा कोई बंदर नहीं
    इसीलिए तो
    बेलाग है
    बेलगाम है
    और इंसान हैरान है
    परेशान है.

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